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पाप कर्मो का फल व्यक्ति को स्वयं ही भोगना  पड़ता है! कोई अनुष्ठान आपके पाप कर्म नही काट सकता है- आचार्य आनंद पुरूषार्थी जी

धामनोद। आर्य समाज धामनोद व सैलाना के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित चार दिवसीय वेद कथा के दूसरे दिन के कार्यक्रम में वैदिक प्रवक्ता के रूप में नर्मदापुरम से पधारे अन्तर्राष्ट्रीय मूर्धन्य वैदिक विद्वान् आचार्य आनन्द जी पुरुषार्थी  जी ने बताया कि आज समाज में व्यक्ति बुरे पाप कर्म करता है और सोचता है कुछ पुण्य, परोपकार, धर्म, दान, कोई अनुष्ठान करके से मुझे किये हुए पाप कर्मों से मुक्ति मिल जाएगी, मेरा पीछा छूट जाएगा यह केवल स्वयं की अज्ञानता व भ्रम है! गीता में श्रीकृष्ण जी कहते है  -अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।*

व्यक्ति को अपने किये हुए अच्छे अथवा बुरे जैसे भी कर्म किये है  उनका फल उसे भोगना ही पड़ेगा। अच्छे कर्म का अच्छा फल यानी पुण्य! व बुरे कर्म का बुरा फल यानी दुःख। इससे व्यक्ति बच नही सकता है!

साथ ही यह भी बताया की हमारी आत्मा संसार में शरीर धारण करता है । शरीर प्रकृति से बना है । प्रकृति में सत्व रज और तम , ये तीन तरह के परमाणु हैं। सत्त्वगुण, अच्छे विचार सेवा परोपकार की भावना उत्पन्न करता है । रजोगुण,  स्वार्थ चंचलता स्पर्धा दुख आदि भावनाओं को उत्पन्न करता है । तमोगुण झूठ छल कपट धोखा बेईमानी चोरी डकैती लूट मार की ओर प्रेरित करता है। अब आप ही तय करे यदि आप सुख शांति चाहते हो तो वह सत्वगुण से ही मिलेगी, बहाना नहीं चलेगा। सात्विक जीवन जीना ही सुखदायक है। रज और तम  के प्रभाव से युद्ध करें , सात्विक बनें और सुखी होवें।

कार्यक्रम में बिजनौर से पधारे सुविख्यात भजनोपदेशक मान्यवर पण्डित भीष्म जी के द्वारा भी मधुर प्रेरक भजनों का श्रवण करवाया गया ओर कथा के दूसरे दिन सैलाना, रतलाम, सहित आसपास के कई श्रद्धालुओं ने इस वेद कथा के आयोजन में अपनी उपस्थित देकर पुण्य लाभ लिया।

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Author: MP Headlines

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