आवाज सुनते ही दौड़ी चली आती है ‘राधे’: इंसान और गिलहरी के बीच पांच साल से कायम अनोखा रिश्ता

  • मनोज कुमार राठौर ‘माद्रेचा’ की आवाज पहचानती है मूक गिलहरी,
  • 100-150 फीट दूर नीम के पेड़ से पहुंच जाती है पास; दाना-पानी लेकर लौट जाती है अपने आशियाने में

रतलाम/सैलाना। आज के दौर में जब इंसान छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से दूर होता दिखाई देता है, वहीं रतलाम के टेलीफोन नगर और चमरिया नाका क्षेत्र से सामने आई एक अनोखी कहानी इंसानियत और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना का खूबसूरत संदेश दे रही है।

यहां मनोज कुमार राठौर ‘माद्रेचा’ पिछले करीब पांच वर्षों से गिलहरियों को दाना-पानी खिलाते आ रहे हैं। इसी दौरान करीब तीन वर्षों से ‘माही’ और पिछले लगभग दो वर्षों से एक गिलहरी के साथ उनका विशेष लगाव बना हुआ है। वर्तमान में उन्होंने इस मूक गिलहरी का नाम प्यार से ‘राधे’ रखा है।

आवाज लगाते ही पेड़ से उतर आती है राधे

मनोज की दुकान से करीब 100 से 150 फीट की दूरी पर स्थित नीम के पेड़ पर राधे का आशियाना है। प्रतिदिन दोपहर में मनोज अपनी दुकान की छत पर भोजन करने जाते हैं। इस दौरान जब वे राधे को आवाज लगाते हैं तो कुछ ही देर में वह नीम के पेड़ से निकलकर उनकी ओर आती दिखाई देती है।

मनोज की आवाज को पहचानने वाली राधे उनके पास पहुंचकर दाना-पानी ग्रहण करती है। कुछ समय उनके आसपास रहने के बाद वह वापस अपने आशियाने की ओर लौट जाती है।

बोल नहीं सकती, लेकिन पहचानती है आवाज

इस रिश्ते की सबसे खास बात यही है कि राधे एक मूक जीव है। वह इंसानों की तरह बोल नहीं सकती, लेकिन मनोज की आवाज को पहचानती है। वहीं मनोज भी उसकी दिनचर्या और जरूरतों को समझते हैं।

यह रिश्ता किसी एक-दो दिन की घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे विश्वास और स्नेह का परिणाम है। मनोज इस आत्मीय पल को अपने वीडियो के माध्यम से भी लोगों तक पहुंचाते हैं।

एमपी हेडलाइंस संवाददाता ने देखा पूरा दृश्य

इस अनोखे रिश्ते का प्रत्यक्ष दृश्य एमपी हेडलाइंस के सैलाना संवाददाता कृष्णा राठौर ने लाइव देखा। उन्होंने बताया कि मनोज द्वारा आवाज लगाए जाने के बाद गिलहरी का उनके पास आना और दाना-पानी ग्रहण कर वापस लौट जाना बेहद सहज और भावुक करने वाला दृश्य था।

राधे का मौन संदेश इंसानों के नाम

मनोज और राधे की यह कहानी केवल इंसान और एक गिलहरी के बीच लगाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, करुणा और संवेदना की उस भाषा को सामने लाती है, जिसे व्यक्त करने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती।

राधे के पास इंसानों जैसी भाषा नहीं है, फिर भी वह विश्वास के साथ मनोज की आवाज पर उनके पास पहुंचती है। यह दृश्य समाज के सामने एक सहज संदेश भी रखता है कि संवेदनशीलता केवल मनुष्यों के बीच रिश्तों तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

जाति, धर्म, विचार और राजनीतिक मत अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाएं, आपसी सम्मान और जीव-जंतुओं के प्रति करुणा किसी विचारधारा की मोहताज नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, पसंद-नापसंद अलग हो सकती है, लेकिन मानवीय संवेदनाएं और आपसी सम्मान किसी विचारधारा के मोहताज नहीं होने चाहिए। किसी को छोटा दिखाने के बजाय उसे समझना, जरूरतमंद के प्रति दया रखना और जीव-जंतुओं के प्रति करुणा रखना ही समाज को बेहतर बनाता है।

राधे रोज कुछ दाने खाकर अपने आशियाने में लौट जाती है, लेकिन पीछे छोड़ जाती है एक बड़ा संदेश—

“प्रेम बांटने के लिए भाषा नहीं, केवल संवेदनशील हृदय चाहिए।”

शायद यही इस अनोखे रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात है कि एक छोटी-सी मूक गिलहरी इंसानों को भी इंसानियत का बड़ा पाठ पढ़ा रही है।

आज जब समाज में अपने हित के लिए जाति, धर्म, विचारधारा और राजनीतिक मतभेदों के कारण लोग एक-दूसरे से दूरी बनाने लगते हैं, तब राधे: गिलहरी और मनोज का यह रिश्ता एक सहज सवाल खड़ा करता है—जब एक मूक जीव बिना किसी भेदभाव के प्रेम और विश्वास को समझ सकता है, तो इंसान इंसान से क्यों दूर हो?

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Author: MP Headlines