- गांव का तालाब भरेगा, तभी खेतों में हरियाली खिलेगी।
- तालाब बचेंगे, तभी खेत, पशु और जीवन सुरक्षित रहेंगे।
सैलाना। सैलाना ब्लॉक के ठिकरिया पंचायत के ग्राम पानीबड़ में वाग्धारा संस्था द्वारा परंपरागत हलमा पद्धति से जल संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधनों को बचाने हेतु सामुदायिक श्रमदान कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ग्रामीणों ने एकजुट होकर तालाब की पाल पर पत्थर जमाने, मिट्टी निकालने का कार्य किया। इस पहल का उद्देश्य गांव में जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना, भू-जल स्तर बढ़ाना तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी सुरक्षित रखना रहा।
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों को समझाया गया कि लगातार घटते जलस्तर और बढ़ते तापमान का सीधा प्रभाव मनुष्य, पशु, खेती, जंगल और पर्यावरण पर पड़ रहा है। पानी की कमी के कारण खेतों में नमी घट रही है, जिससे फसलों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनने से किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण पशुओं के लिए पानी और चारे की समस्या भी बढ़ रही है, वहीं जंगलों और पेड़-पौधों पर भी इसका नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है।

ग्रामीणों को बताया गया कि यदि समय रहते जल संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में पेयजल संकट और गंभीर हो सकता है। तालाब, कुएं और अन्य जल स्रोतों का संरक्षण करने से वर्षा जल का संग्रह होगा, जिससे भू-जल स्तर बढ़ेगा और खेती के लिए पानी उपलब्ध रहेगा। मिट्टी में नमी बनी रहने से भूमि की उर्वरता भी सुरक्षित रहेगी तथा किसानों की फसल उत्पादन क्षमता में सुधार होगा।
माही मध्यप्रदेश यूनिट लीडर धर्मेंद्र सिंह चुंडावत ने कहा कि जल संरक्षण केवल एक अभियान नहीं बल्कि जीवन बचाने का संकल्प है। उन्होंने कहा कि “यदि आज हम पानी बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करेंगे तो आने वाली पीढ़ियों को जल संकट का सामना कम करना पड़ेगा। जल संरक्षण से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायता मिलेगी।” उन्होंने ग्रामीणों से वर्षा जल संचयन, तालाब संरक्षण और पानी के सीमित उपयोग को अपनाने की अपील की।

ब्लॉक सहजकर्ता पिंकी टेलर ने परंपरागत हलमा पद्धति के महत्व को बताते हुए कहा कि पहले गांवों में लोग सामूहिक श्रमदान से तालाब, कुएं और चारागाहों को सुरक्षित रखते थे, जिससे गांव में वर्षभर पानी उपलब्ध रहता था। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि जल, जंगल, जमीन, मिट्टी, बीज, पशु और खेती सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि पानी सुरक्षित रहेगा तो खेती मजबूत होगी, पशुओं को पानी मिलेगा, मिट्टी की नमी बनी रहेगी और गांव का पर्यावरण संतुलित रहेगा।
कार्यक्रम में कास कॉर्डिनेटर मोहन भूरिया,सामुदायिक सहजकर्ता राकेश पारगी, मनोज डामर, दिव्या शर्मा, अमृतराम परिहार, कांतिलाल गहलोत सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम में सभी ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने का संकल्प लिया l
Author: MP Headlines












